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व्यवस्था सड़ी हो तो भ्रष्टाचार पनपता है , अवस्था उघडी हो तो अनाचार पनपता है --- विनोद भगत

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कहानी .....एक और गुलाबो

Posted On: 5 Mar, 2014 Others में

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मैं नया नया इस शहर में आया था। पहली पोस्टिंग थी। बड़ी मुश्किल से एक कमरा मिला। उसमें भी कई प्रतिबंध नौ बजे बाद नहीं आओगे, लाइट फालतू नहीं जलाओगे, वगैरा वगैरा। खैर, मुझे कमरा चाहिये था। प्रतिबंधों और शर्ताे से मैने समझौता कर लिया। मकान मालकिन एक अधेड़ किन्तु रौबीले व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। पहले ही दिन उसने मुझ पर अपने रौबीले भारी भरकम व्यक्तित्व की छाप छोड़ दी। मैं मन ही मन सोच रहा था कि खुले और स्वच्छंद माहौल में रहने का आदी में इस प्रतिबंधित वातावरण के जाल की छटपटाहट में कैसे रह पाऊंगा। किन्तु अगले कुछ दिनों में वह हुआ जिसकी मैंने कभी कल्पना भी न की थी। मैं प्रतिदिन अपने आफिस रिक्शा से ही आता जाता था मेरा कमरा सड़क की तरफ था इससे मुझे विशेष दिक्कत नहीं होती थी। मेरी मकान मालकिन का नौकर मेरा विशेष ख्याल रखता था। शायद उसे इस बात के निर्देश थे। एक दिन शाम के समय जब मैं अपने कमरे में वापस आ रहा था कि गली के नुक्कड़ पर मुझे एक युवती दिखाई दी। गौर वर्णीय उस युवती का सौंदर्य अनुपम तो नहीं कहा जा सकता किन्तु आकर्षक अवश्य कहा जा सकता है। मैं गली के नुक्कड़ पर ही रिक्शे से उतर गया। पैदल जब उस युवती के नजदीक पहॅुचा तो भांप गया कि युवती दिन हीन अवस्था में थी किन्तु उसकी आंखों में शरारती चमक साफ दिखाई दे रही थी। मैं अपने कमरे की ओर बढ़ गया वैसे भी चरित्र के मामले में मैं अपने आप को साफ समझता हूँ। कमरे के पास पहुँचते ही जैसे मैने ताला खोला कि मुझे पीछे आहट सुनाई दी। पीछे मुड़कर देखा तो वहीं युवती खड़ी थी। थोड़ी देर तक हम दोनों में संवादहीनता की स्थिति रही। युवती ने दोनांे हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन किया। जबाव में मैंने पूछा,‘‘क्या चाहिये।’’ चहकती श्री युवती बोली, ‘‘ बाबूजी मैं गुलाबो हँू। तो , मैं क्या करूँ, ‘‘ मैं उस युवती के सान्निध्य से उतना आनंदित नहीं था जितना इस बात से आंतकित था कि कहीं मेरी मकान मालकिन ने मुझे किसी युवती से बात करने देख लिया तो न जाने मेरा क्या हश्र हो। इसलिये मैंने उससे पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से रूखेपन से बात की। अभी मैं उससे छुटकारा पाने के बारे में सोच ही रहा था कि मुझे एक आवाज सुनाई दी अरे गुलाबो, ‘‘यहां क्यों आई है, बाबू जी क्या आपने इसे बुलाया है।’’ गुलाबो चहकी ,’’ अरे नहीं, काका, मैं खुद आई हूॅं बाबूजी ने नहीं बुलाया।’’ गुलाबो ने भी एक निर्णायक की भांति मुझे तत्काल दोष मुक्त कर दिया। काका ने मुझे कुछ कहने के बजाय गुलाबो को लगभग डंाटने वाले अंदाज में कहा कि गुलाबो, तू यहां मत आया कर मालकिन नाराज होती है। गुलाबो चली गई किन्तु मेरे समक्ष एक अबूझ पहेली बन कर ख्यालों में खड़ी रही। मैंने काका की ओर प्रश्न भरी नजरों से देखा काका संभवतः मेरी आंखों के प्रश्न को पढ़ चुके थे। उन्होनें राज भरे अंदाज में कहा बाबूजी, ऐसी लड़कियों के चक्कर में मत पड़ना ये खुद तो बदनाम है। आपको भी कहीं का नहीं छोड़ेगी। काका ने मुझे सलाह दी या फिर सलाह के बहाने धमकाया मैं समझ नहीं पाया। वैसे भी ‘औरत’ शब्द की मैं काफी कद्र करता है। खास तौर से ऐसी औंरते ं जिनके साथ ‘बदनाम’ शब्द जुड़ता है मैं कई बार सेाचता हूँ कि औरत की बदनामी का मूल कारण पुरूष की ‘हवस’ है फिर बदनामी का दाग अकेले औरत के दामन पर ही क्यांे? और मैं कभी इस प्रश्न का संतोष जनक उत्तर नहीं ढूंढ पाया। मेरी वह रात गुलाबो के बारे में सोचते-सोचते कटी। सुबह आफिस के लिये तैयार हो रहा था कि दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। मैंने झांककर देखा तो मेरी सांस थम सी गई। दरवाजे पर गुलाबो खड़ी थी बिना किसी दरवाजे पर गुलाबो खड़ी थी। बिना किसी औपचारिकता के वह मुझे एक तरफ कर कमरे के अंदर आ गई। मैं स्वरहीन स्तब्ध सा कमरे में खड़ा हो गया। मेरी संास की आवाज भी कमरे में गंूज रही थी। एकाएक गुलाबो ने स्तब्धता तोड़ी। शोख और चंचल आवाज में बोली’’, बाबूजी, आप यहां अकेले रहते है। मैं जानती हूँ। आप मुझे काम पर रख लीजिये आपका सारा काम कर दिया करूंगी। हां, महीने के पैसे पहले तय करने होंगे।’’ एक साँस में गुलाबो ने अपने आने का मंतव्य समझाया और मेरे हां या न की प्रतीक्षा किये बगैर गुलाबो ने स्वयं को मेरी सेवा में नियुक्त भी कर लिया। अब तक मैं स्वयं को नियत्रिंत कर चुका था। मैंने हल्के स्वर में कहा ‘‘गुलाबो, मैं अपना काम अपने आप कर लेता हूँं। मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है। गुलाबो, जो अब तक चहक रही थी, उदास सी बोली ‘‘ तो बाबूजी, मेरे बारे में आपसे भी काका ने उल्टा सीधा कह दिया। पर बाबूजी मैं वैसी नहीं, जैसा कहते हैं। आप ही बताओं, क्या बिना मां बाप के होना गुनाह है? इसमें मेरा क्या कसूर है?’’ इतना कुछ कहने में गुलाबो की आंखों में आंसू आ गये थे। उसकी निश्छलता व साफगोई का मैं कायल होता जा रहा था मेरा हृदय ‘औरत’ की इस दशा से द्रवित हो रहा था। पर मन की संवेदनायें मन में ही दबी रही। मैंने उससे इतना ही कहा, ‘गुलाबो, अब मुझे आफिस जाना है देर हो रही है।’’ गुलाबो जाते जाते बोली,‘‘ बाबूजी मैं जा रही हूँ शाम को आऊंगी। मुझे बता देना कब से काम पर आना है।’’ वह मेरे जबाव की प्रतीक्षा किये बगैर चली गई। .मैं विचारों में खोता चला गया शाम को वह फिर आयेगी मैं इस कल्पना से सिहर उठा। क्या मैं उसे काम पर रख सकता हूॅं ? क्या मुझे उसकी जरूरत है? या फिर मेरे वहां काम करना उसकी जरूरत है? अगर मैने उसे काम पर रख लिया तो….? प्रश्नों के इस चक्रव्यूह में खोया मेरा सिर भन्ना उठा था मैंने सिर को झटक कर विचारों को परे किया। मैं उस दिन जैसे ही आफिस पहॅुचा तो मेरे सहकर्मी अरूण बाबू ने मुझे टोकते हुयंे कहा सुधीर जी, आज कुछ खोये-खोये से लग रहे हैं। जबाव में मैं सिर्फ मुस्करा दिया। भीतर चल रहे विचारों के झंझावात स्वयं कोे मुक्त करने का प्रयास करते हुये मैं पूर दिन कार्यालय के कामों को अन्मयस्क भाव से निपटाता रहा। शाम होते ही कार्यालय से छुट्टी के बाद मैं सीधे कमरे पर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। मुझे भय था कि गुलाबो जरूर आयेगी और तब मुझे उसे जबाव देना मुश्किल हो जायेगा। इधर-उधर भटकता रात साढ़े आठ बजे तक मैं अपने कमरे पर पहॅुचा । मकान मालकिन बाहर हो खड़ी थी। मुझे देखते ही सवाल दागा, सुधीर बेटा आज बड़ी देर से आये क्या आफिस में कोई काम था। मैंन भी सीधा सा जबाव दिया। आंटी, आज कुछ काम ज्यादा था। मकान मालकिन मेरे जबाव संे सतंुष्ट होकर चली गई। मैं कमरे का ताला खोलकर अंदर गया और सीधे चारपाई पर लेट गया। पन्द्रह बीस मिनट तक यंूं ही बिना लाइट जलाये विचारों में खोया रहा मेरा गुलाबो से कोई संबंध नहीं था परन्तु फिर भी उसने मेरे विचारों पर कब्जा कर लिया था मैं पता नहीं कितनी देर तक ऐसे ही पड़ा रहता अचानक एक आहट सुनाई दी जिसने मेरे विचारों की श्रृंखला को भंग कर दिया। आहट के साथ ही चाहती आवाज आई गुलाबों की बाबूजी अंधेरे में क्या कर रहे हो। मैं आपके लिये खाना लाई हंँंू।’’ गुलाबो को स्वर में अधिकार और अपनत्व भरा हुआ था। परन्तु गुलाबो की आवाज है रोमांंिचत होने के बजाय मैं भय से सिहर उठा। उठकर लाइट जलाई हाथ मेें टिफिन लिये गुलाबंो का मासूम सौन्दर्य मेरे सामने खड़ा था। उसकी आखांे में एक आजीब सा अपनत्व भरा आमंत्रण था। मैं कुछ सकपका गया। अचानक मैने उसे डांटते हुये कहा कि कौन होती हो तुम मेरी, क्यों लाई हो खाना।’’ गुलाबोेे के चेहरे की मासूमियत समाप्त हो गई उसकी आंखों से आंसू बह निकले। सिसकिया भरती हुई गुलाबो बोली, बाबूजी कोई रिश्ता बनाना जरूरी है। मैं औरत जात और तुम मरद जात । औरत मरद का कोई रिश्ता होना जरूरी है बगैर रिश्ते के कोई किसी से कोई बात नहीे कर सकता क्या आप भी उन मरदो में से हो। जो मुझसे अपना रिश्ता बनाना चाहते हो ।’’ एक सांस में गुलाबो ने मुझे भाषण दे डाला मैं निरूत्तर होकर उसका मुंह ताकने लगा। बाबूजी ये खाना रखा है खा लेना मुझे काम पर रखना या न रखना आपकी इच्छा है। मेरी खातिर आप बदनाम हो ये मैं नहीं चाहती । कल इतवार है मैं कल दिन में आऊंगी तब आपसे बात करूंगी। मेरे जबाव की प्रतीक्षा किये बिना गुलाबो वहां से चली गई। मै यंत्रवत खड़ा और ठगा सा रह गया। ऐसा लग रहा था मानों मेरेे कानों में कोई तूफान आकर गुजर गया हो। गुलाबो के जाने के बाद मैं काफी देर तक मैं किंकर्त व्यूविमूढ़ अवस्था में रहा मुझे भूख का अहसास हुआ। जब एकाएक गुलाबो द्वारा लाये गये टिफिन का ध्यान आया। मैंने टिफिन खोल कर उसका जायजा लिया। सुस्वाद भोजन की खुशबू से मन आनंदित हुया। सारे विचारों और ख्यालों को परे झटक कर मैं पेट पूजा में जुट गया। भोजन के बाद तृप्त होकर मैं सोने की तैयारी करने लगा अगले्र दिन रविवार था इसलिये देर तक सोता रहा। किसी ने द्वार पर दस्तक दी। मैंने उठकर दरवाजा खोला। मकान मालकिन का नौकर खड़ा था। मैने प्रश्नवाचक नजरों से उसे देखा। मैं उसकी बूढ़ी अवस्था को देखते हुये उसे काका ही कहता था। मैंने पूछा,‘‘ काका क्या बात है।’’ बाबूजी मकान मालकिन जी आज बाहर गई है उन्होंने आपके लिये कहला भेजा है दिन में आपकी छुट्टी है इसलिये घर का ध्यान रखें। मैने पूछा, ‘‘ कहा गयीं है’’। ‘यही पास के शहर हल्द्वानी में अपनी बेटी के घर। रात तक आ जायेगी’ कहकर काका जाने लगे एकाएक ठिठक कर रूके और बोले बाबूजी में भी दोपहर तक कंही जा रहा हूॅं मेरे पीछे जरा ध्यान रखना’ यह कहते हुये उस बूढ़े व्यक्ति की आंखो में झिझक थी जिसे मैंने महसूस कर लिया। वह नौकर था और मेरी पोजिशन उससे कहीं ऊपर थी मैं समझ गया और मैंने उसे अपराध बोध से मुक्त करते हुये कहा ‘ काका, मैं तुम्हारे लड़के जैसा हँू। मुझसे कोई बात कहने में झिझक कैसी ’ जबाब मैं उस बूढ़े ने कहा कि बाबू जी भगवान तुम्हें खूब सारा आशीर्वाद दे मैं तो आखिर नौकर जात हूँ न ’ मैं हंस पड़ा इस बूढ़े ने तो जातिवादी व्यवस्था में एक और जाति जोड़ दी नौकर जात । मैंने उसे आश्वस्त किया जाओं काका आराम से जाओ। नौकर के जाने के बाद मैं गुनगुनाता हुआ नित्य कर्म से निवृत्त होने लगा पता नहीं क्यों आज गुलाबो मेरे जेहन में नहीं थी। नहा धो कर मैं कहीं बाहर जाकर नाश्ते की तैयारी में था। कुर्ता पायजामा पहनकर जैसे ही कमरे से बाहर निकला तो सामने खिल-खिलाती हुई गुलाबो खड़ी थी । उसके मुुख पर बीती रात हुई बातों का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं था। दरअसल गुलाबो में यही एक खूबी थी वह जितनी बार भी मुझे मिली ताजी हवा की भीनी-भीनी खुशबू के साथ बीते पलों की कड़वाहट को वह कहीं थूक कर आती। बाबूजी नाश्ता करने जा रहे हैं गुलाबो मेरे कुछ कहनेे से पहले ही मेरे गंतव्य का खुलासा करते बोली। मैंने सोचा जब यह अनपढ़ युवती बीती कड़वाहट को भूलकर निश्छल भाव से व्यवहार कर सकती है तो इससे तो मैं बेहतर हूँ। अतः ‘गुलाबो, तुम सही कर रही हो।’ गुलाबो संभवतः मेरे मुस्कराते चेहरे से निडर हो चली थी मोनालिसा सी विश्व प्रसि( मुस्कान के साथ गुलाबो बोली, ‘‘ बाबूजी आप कमरे में बैठंे मैं आपके लिये नाश्ता लेकर आती हूँ।’’ कहकर गुलाबो कमरे के अंदर गयी और रात वाला टिफिन उठाकर चली गई। इस का तो उसने मुझे ना कहने का अवसर तक नहीं दिया। और मैंने भी स्वयं को परिस्थतियों के हवाले कर दिया। दरअसल न तो आज मकान मालकिन थी और न नौकर इसलिये मुझे कोई खास भय नहीं था। मैं कमरे में बैठा था कि एक सज्जन मेरे कमरे में सीधे आ गये। वह मेरे पड़ोस में रहते थे। अंदर आकर मुझसे नमस्कार करते हुये बोले आपका नाम सुधीर बाबू है न मैंनेे ‘हां’ में सिर हिलाया और मेरा नाम रामपाल उन्होंने जबाव दिया। ‘कहिये ’ ‘ कैसे आना हुआ’ ‘अजी साहब आप हमारे पड़ोसी है और पड़ोसियों से जान पहचान करना कोई बुरी बात है क्या,‘‘ रामपाल ने कहा और यह कहते हुये उसके चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान थी । मैं उसका अर्थ नहीं समझ पाया था। अतः प्रश्नवाचक नजरों से उन्हें देखने ‘‘ अरे साहब, आप तो बड़े रंगीन मिजाज है।’’ रामपाल के यह शब्द मेरे हृदय पर भाले की तरह चुभे। मैं समझ गया उसका इशारा गुलाबोे की तरफ है मैं कुछ जबाव देता उससे पहले ही गुलाबो नाश्ता लेकर पहुँच गयी रामपाल को मुझसे बात करते देख गुलाबो का चेहरा बुझ गया। मैंने र्निविकार भाव से गुलाबो को देखा। गुलाबो सकपका गई। जाते जातेे बोली, ‘बाबूजी, आज मैं आपको अपने बारे में सब कुछ बताऊंगी रामपाल जैसे लोग ही मेरे बारे में अनाप शनाप बाते करते है।’’ इतना कहकर गुलाबो चली गयी। इस बार गुलाबो मुझे विचारों के भंवर मेंे डूबते उतरते छोड़ गयी थी। वह कौन थी और मुझे क्या बताना चाहती थी अपने बारे में? और फिर मुझे ही क्यों बताना चाहती थी? मेरा मस्तिष्क झन्ना उठा था। आज रविवार का दिन मैं चैन और इतमीनान से गुजारना चाहता था किन्तु पहले रामपाल और फिर गुलाबो इन दोनों ने अपने परस्पर विरोेधी व्यवहार से मुझे विचलित कर दिया था। मैं दोपहर तक का समय कैसे बिता पाया मैं खुद नहीं जानता। कमरे पर बैठा-बैठा पत्र पत्रिकाओं को पढ़कर अपने मस्तिष्क को तरो ताजा करने की कोशिश कर रहा था। परन्तु पढ़ने के दौरान मेरी आंखों के समाने गुलाबो कर रहस्यमयी चेहरा तैरने लगता था और जब तक मैं गुलाबों के बारे में कुछ जान नहीं लेता मेरा मन अशांत सा ही था। हालाकिं मुझे गुलाबो से कुछ लेना देना नहीं परन्तु उसका रहस्यमयी व्यवहार और रामपाल द्वारा उसे इंगित कर कहीं गई बात ने मुझे विवश का दिया था गुलाबो नाम की बंद किताब केे पन्नों को मैं पढ़ना चाहता था। मुझे वह किसी जासूसी उपन्यास के ससपेंस की कहानी सी लगने लगी थी और मैं बड़ी आतुरता से गुलाबो की प्रतीक्षा करने लगा यह मुझे अचानक क्या हुआ था जिस गुलाबो के आने की कल्पना मात्र से मैं सिहर उठता था आज उसी गुलाबो की प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे उसकी प्रतीक्षा का एक पल भारी लगने लगा था। मेरे अर्तमन ने मुझे टोका पर आज मेरा ही मन मेरे बसमें नहीं था आखिर गुलाबो आ गई। आज गुलाबो कुछ बोलती उससे पहले ही मैं व्यग्र स्वर में उससे पूछ बैठा, ‘‘ गुलाबो तुम कौन हो। ’’ मेरे इस प्रश्न पर गुलाबो खिल खिलाकर हंस पड़ी उसकी वह अल्हड़ हंसी मेरे हृदय की गहराइयों में उतर गई। मुझे लगा गुलाबो मेरा उपहास उड़ा रही है। मैं आक्रोशित हो उठा चेहरे को देखकर गुलाबो की खिलखिलाहट थम गई। ‘‘बाबूजी, मैं एक लड़की हूँ।’’ नही गुलाबो तुम एक पहेली हो’’ मेरा प्रश्न भरा जबाव था।’’ क्यों बाबूजी , आज तक तो सारे मरद मुझे लड़की की ही नजर से देखते की ही नजर से देखते आये है। मुझे खा जाने वाली नजरों से मेरे शरीर को हवस भरी निगाहों से देखते है पर बाबूजी आप की नजरों में मुझे हवस नहीं दिखाई देती और इसीलिये में चाहती हूँ कि आपको अपने बारे में सब कुछ बता हूँ।’’ हां गुलाबो, मुझे बताओ मैं और अधिक व्यग्र हो चुका था। बाबूजी मैं इसी मौहल्ले में रहती हूँ। मेरा पिता एक अवारा और शराबी था शराब के लिये उसने मेरी मां का खून कर दिया और अब जेल में सजा काट रहा है। रह गई मैं लड़की जात। एक अकेली लड़की को समाज में जिन-जिन हालातों का सामना करना पड़ता है आप जानते है जो उसके चरित्र पर उगुंली उठाते हे उन्हीं के मन में यह ख्वाहिश होती है । परन्तु बाबूजी मैं आज भी बेदाग हूँ। बस मेरी कहानी इतनी सी है। हां, मंै प्यार करती हँू ।अपने राजकुमार से, और एक दिन मैंे चली जाऊंगी। गुलाबो चली जायेगी यहां से। यहां के लोग समझते है कि गुलाबो छिनाल है पर गुलाबो अपने आप से संतुष्ट है पर बाबूजी मैं आपको जरूर बताना चाहती थी कि मैं क्या हूँ कम से कम कोई तो हो जिससे गुलाबो अपने दिल की बात कहती जिसे अपने बेदाग होने का विश्वास दिलाती । इन लोगों के बीच मुझे आप पर ही विश्वास था। इतना कहते कहते गुलाबो की आंख नम हो गयी। मुझे गुलाबो के एक एक शब्द पर यकीन था। गुलाबो ने अपना अतीत और वर्तमान मेरे सामने खोलकर रख दिया था काफी कुछ उसने अपने भविष्य का भी खुलासा कर दिया था। उसके मन में भी आम भारतीय लड़कियों की भांति एक सपना था एक सुंदर और राजकुमार सरीखे पति का जिसके प्रेम और सान्निध्य में वह अब समाज से मिली रूसवाइयों और उलाहनों को भुलाकर सुखद स्वप्नों को साकार करने को उत्साहित थी। वास्तव में गुलाबो आम समाज की वह आम लड़की थी जो जीवन को सरलता से जीना चाहती थी। किन्तु अकेलेपन से अभिशप्त वह युवती स्वर्णिम स्वप्नोें की आकांक्षा में जिये जा रही थी मैं दावे से कह सकता हूँ कि समाज में कई गि( दृष्टियों के बावजूद गुलाबो अभी भी अक्षता थी उसने एक संस्कारवान युवती की भांति अपने कौमार्य को बचा कर रखा था। वास्तव में गुलाबो एक साहसी युवती थी। कई बार उसके अल्हड़पन और उच्छश्रृंखल व्यवहार से किसी को उसके चरित्र के बारे में शंका हो सकती थी। पर गुलाबो ऊषा काल के समय पड़ने वाली सूर्यरश्मियों की भांति निर्मल और शीतल थी। गुलाबो ने मुझ पर अपना पूरा प्रभाव छोड़ दिया था मैं सोचने लगा कि गुलाबो का भविष्य कैसा होगा? क्या उसकी स्वर्णिम संसार की अभिलाषा पूर्ण हो पायेगी या समाज सदैव उसे भोग्या के रूप में ही मान्यता देगा और अंत में वही समाज उसे तिरस्कृत कर देगा जो उसके यौवन के रस को चूसना चाहता है। बहरहाल मेरे पास और भी बहुत कुछ काम थे मैंने गुलाबो की ओर से अपना ध्यान हटा दिया था। अगले दिन रोज की तरह मैं अपनी दिनचर्या में व्यस्त था। गुलाबो ने अब यह क्रम बना लिया था कि वह सुबह मेरे लिये नाश्ता बनाकर लाती। मैं नहीं जानता वह कहां से लाती परन्तु मैंने यह सोचकर कि उसे दुख होगा मैंने उसे नहीं टोका। लगभग दो माह तक यह क्रम चलता रहा। यहां तक कि मेरे और गुलाबो के बारे में तरह तरह की अफवाह उड़ने लगी परन्तु अफवाहों की मैं परवाह नहीं करता। और एक दिन शाम को जब मैं आफिस से लौटा तो मेरे पड़ोसी रामपाल ने मुुझे आकर खबर सुनाई कि सुधीर बाबू, आपकी चिडि़या तो उड़ गई। मैं रामपाल की बात का मतलब नहीे समझा मैने उनसे कहा, ‘क्या कह रहे हैं। रामपाल जी।’ अजीब से अंदाज में हाथ हिलाते रामपाल ने कहा ’’ अजी वही गुलाबो अपने यार के साथ भाग गयी रामपाल बाबू के कहने के अंदाज से मुझे बुरा लगा। साथ ही एक संतोष का अनुभव भी हुआ कि चलो गुलाबो को उसका राजकुमार मिल गया। धीरे-धीरे गुलाबो के चर्चे मौहल्ले में लोगों की जुवान पर चट्खारे लेकर सुनाये जाते रहे जिसमें मैं भी एक पात्र होता था लेकिन समय बीतने के साथ लोग गुलाबो को भूलते चले गये मैं भी आफिस के कामों में इतना व्यस्त हो गया कि गुलाबो की स्मृतियां धुंधलाने लगी तीन वर्ष बीत गये एक शाम जब मैं आॅिफस से लौटा तो मेरे कमरे के बाहर एक निस्तेेज और बुझे हुये चेहरे वाली कमजोर महिला गोद में एक बच्ची को लिये खड़ी थी मुझे देखते ही उसने कहा बाबूजी, नमस्ते आवाज सुनकर मैं चैंक उठा यह तो गुलाबो थी लेकिन उसकी हालात देखकर मेरा मन करूणा से भर उठा मैंने पूछा, गुलाबो , तुम यहां कैसे ? मैंने यह प्रश्न जितने अपनत्व और करूणा के साथ पूछा था गुलाबो उससे अभिभूत हो फफक कर रो पड़ी, बोली, बाबूजी मेरा नसीब खोटा है जिसे मैं राजकुमार समझी थी वह राक्षस निकला मुझे छोड़कर किसी और के साथ घर बसा लिया’ मैं गुलाबो के जबाव से ज्यादा उसकी गोद में हालात से बेखवर मासूम बच्ची की ओर देख रहा था जो आने वाले समय में एक और गुलाबो बनने जा रही है। समाज में गुलाबो के पैदा होने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। -विनोद भगत……………….

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

March 5, 2014

sachchai ko bahut khoobsurati se aapne shabdon me utara hai .

विनोद भगत के द्वारा
March 6, 2014

शालिनी जी ,आपका आभार ,आपके उत्साहवर्धन से मेरे शब्दों को बल मिला है

deepakbijnory के द्वारा
March 6, 2014

समाज me ऐसी महिलाओं की कमी नहीं सुंदर प्रस्तुति आदरणीय विनोदजी http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/03/05/नारी-तू-नारायणी-कविता/

विनोद भगत के द्वारा
March 7, 2014

धन्यबाद दीपकजी ,

विनोद भगत के द्वारा
March 7, 2014

योगी सारस्वत जी ,आपकी टिपण्णी मेरी कलम के लिए संजीवनी है ,धन्यबाद

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 7, 2014

कहानी  समाज के संकुचित नज़रिए पर प्रश्न चिन्ह लगा रही है और प्रस्तुति करण पाठक को बांध कर रख रहा है ,उत्तम रचना ,सादर  बधाई

विनोद भगत के द्वारा
March 8, 2014

निर्मला सिंह गौर जी ,सराहना के लिए आपका आभार


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